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शरद पवार ने उद्धव को कुर्सी पर बिठाकर कालीन क्यों खींच दी ?

महाराष्ट्र की सरकार क्यों गिरना चाहते है शरद पवार ?
महाराष्ट्र की महाआघारी सरकार गिरना तय दिख रहा है, शिवेसना से बगावत करने वाले एकनाथ शिंदे के साथ 40 विधायक होने का दावा किया जा रहा है. अब यह संकट सिर्फ सरकार बचाने का नहीं है बल्कि, शिवसेना पार्टी और शिवसैनिकों को बचाने का है. बाला साहेब ठाकरे की विरासत बचाने का है, जिसे बाला साहेब राज ठाकरे से छीनकर उद्धव को दिया था. 2019 में शिवसेना ने भाजपा का साथ छोड़कर अपने धुर विरोधी पार्टी कांग्रेस और NCP यानि शरद पवार की पार्टी के साथ जाकर सरकार बना ली. वो दिन महाराष्ट्र के लिए ऐतिहासिक था जिसे बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे ने लिखा. पिता को दिए वचन के नाम पर उन्होंने अपने पिता की विरासत ही मिटा दी. हो सकता है शरद पवार सरकार बचाने में कामयाब हो और उनकी बदौलत शिवसेना टूटने से बच जाए, लेकिन मातोश्री की धमक ख़त्म हो गई. एकनाथ शिंदे ने बागी विधायकों 34 विधायकों के हस्ताक्षर और 45 का दावा करने के साथ ही पार्टी पर दावा कर दिया है. नेता सदन से हटाए जाने और पार्टी द्वारा व्हिप जारी होने के बाद शिंदे ने विधायकों के हस्ताक्षर वाली चिट्ठी राज्यपाल और डेप्युटी स्पीकर को भेजा। चिट्ठी में पार्टी कैडर में कांग्रेस, एनसीपी के खिलाफ असंतोष व्यक्त किया गया। चिट्ठी में लिखा गया है कि ढाई साल से पार्टी नेतृत्व ने विचारधारा से समझौता किया। साथ ही इस बात का भी जिक्र किया कि मंत्री नवाब मलिक जिन पर दाऊद इब्राहिम के साथ जुड़ने का सम्बंध है उन्हें अब तक हटाया नहीं गया, इससे हम अपने आप को अपमानित समझ रहे हैं। महाराष्ट्र का पूरा सियासी खेल बस उतना नहीं है जितना tv पर अख़बारों में बताया जा रहा है. एकनाथ शिंदे बिना किसी स्ट्रांग बैक सपोर्ट के इतना बड़ा खेल नहीं कर सकते थे, डायरेक्ट या इन डायरेक्ट BJP का सपोर्ट हासिल है. लेकिन शरद पवार क्यों चुप है ? BJP से तोड़कर शिवसेना और कांग्रेस का गठबंधन करने में सबसे अहम् भूमिका उनकी थी. देवेंद्र फडणवीस और भतीजे अजित पवार की 1 दिन की सरकार गिराकर दोबारा महा विकास अघारी की सरकार बनवाई. महाराष्ट्र की राजनीती का इतना बड़ा खिलाडी अगर चुप है तो जवाब साफ है. क्या शरद पवार ने भी हार मान ली है ? क्या वो खुद चाहते है की सरकार गिर जाये लेकिन उसकी जिम्मेदारी उन पर ना आये ? इन सवालों के कुछ ठोस कारन भी है. एक प्रदेश के दो तिहाई विधायक प्रदेश से बाहर चले जाते है और महाराष्ट्र सरकार के ख़ुफ़िया विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगती. आपको बता दें की गृहमंत्रालय शरद पवार की पार्टी NCP के पास है. दूसरी वजह उद्धव ठाकरे से मुलाक़ात करना कई बार शरद पवार के लिए मुश्किल होता है. इसका जिक्र शरद पवार ने खुद इस घटना पर पहली प्रतिक्रिया देते हुए कहा था की मुंबई जाकर उद्धव ठाकरे से मिलने की कोशिश करूँगा, अगर उनके पास समय होगा तो मिलकर कर बात करूँगा. मतलब शिवसेना विधायकों की ये शिकायत 100 परसेंट सही है की उद्धव ठाकरे किसी को जल्दी मिलने का समय नहीं देते. जिस दिन यह सरकार बनी थी उसी दिन कई जानकारों ने दावा किया था की शरद पवार शिवसेना को ख़त्म कर देंगे. मुख्यमंत्री भले उद्धव ठाकरे थे, लेकिन सरकार शरद पवार चला रहे थे. पिछले ढाई सालो में यह सरकार सबसे ज्यादा अपने यहाँ ख़राब कानून व्यवस्था, वसूली, हत्या, मिस मैनेजमेंट जैसे मुद्दों को लेकर चर्चा में रही है. हर बुरे काम का क्रेडिट उद्धव ठाकरे के खाते में जुड़ गया, सरकार बनने के बाद पार्टी हिंदुत्व के मुद्दे को छोड़ दिया. जिन लोगों से 40 साल तक सड़क से लेकर बूथ थक शिवसैनिक लड़ते रहे चुनाव में उनके साथ खड़े होकर कैसे वोट मांगते. विधायकों को जमीन पर जो फीडबैक मिल रहा था उसे संजय राउत ने शायद उद्धव ठाकरे तक जाने ही नहीं दिया. सरकार गिरी तब भी बची तब भी शुरू से लेकर अब तक और आगे भी नुकसान सिर्फ और सिर्फ शिवसेना का होगा, जब पार्टी का कार्यकर्त्ता यह बात समझ रहा है तो उद्धव को समझ क्यों नहीं आई ? क्या संजय राउत ने निजी फायदे के लिए ठाकरे परिवार और पार्टी को दांव पर लगाने की सलाह दी थी ? चुनावी सभाओं में वो अक्सर पवार के खिलाफ कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया करते थे और खुली आलोचना करते थे। एक चुनावी सभा के दौरान बाला साहेब ठाकरे ने कहा था, 'शरद पवार भरोसेमंद राजनेता नहीं हैं।' ऐसे में अगर उद्धव ठाकरे अपने पिता की इस बात को याद रखते और मान लेते तो आज उन्हें यह दिन नहीं देखना पड़ता।

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